जौनपुर-रवांई को एसटी दर्जा देने की मांग फिर हुई तेज, जनप्रतिनिधियों ने पूरे क्षेत्र को शामिल करने की उठाई आवाज

मसूरी: उत्तराखंड के जौनपुर-रवांई क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिलाने की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। मसूरी नगर पालिका के टाउन हॉल में आयोजित जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की संयुक्त बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि यदि जौनपुर-रवांई को एसटी का दर्जा दिया जाता है तो इसका लाभ पूरे क्षेत्र को मिलना चाहिए, न कि किसी सीमित हिस्से तक ही इसे सीमित रखा जाए।

 

बैठक में मौजूद लोगों ने आरोप लगाया कि कुछ लोग केवल सीमित क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति में शामिल कराने का प्रयास कर रहे हैं। वक्ताओं ने कहा कि ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध किया जाएगा और पूरे जौनपुर-रवांई क्षेत्र को एक साथ एसटी सूची में शामिल करने की मांग की जाएगी।

 

1952 से उठ रही है मांग

 

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि जौनपुर और रंवाई की सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान जौनसार-बावर क्षेत्र से काफी मिलती-जुलती है। रहन-सहन, खानपान, बोली, रीति-रिवाज और जीवनशैली समान होने के बावजूद वर्ष 1967 में जौनसार-बावर को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया, जबकि जौनपुर-रंवाई इससे वंचित रह गया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र को एसटी का दर्जा देने की मांग वर्ष 1952 से लगातार उठाई जाती रही है।

 

पूरे क्षेत्र को मिले लाभ

 

पूर्व पालिकाध्यक्ष मनमोहन सिंह मल्ल ने कहा कि हाल ही में रंवाई और बड़कोट क्षेत्र के कुछ लोगों द्वारा मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे जाने की जानकारी मिलने के बाद क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने यह बैठक बुलाई। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस विषय पर विचार करती है तो जौनपुर और रंवाई के गोडर-खाड़र सहित पूरे क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलना चाहिए।

 

उन्होंने बताया कि इस विषय पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से भी चर्चा की जाएगी। साथ ही इतिहासकारों और विषय विशेषज्ञों की राय लेकर सरकार के सामने मजबूत और तथ्यात्मक पक्ष रखा जाएगा।

 

जनप्रतिनिधियों ने आंदोलन तेज करने का ऐलान

 

जौनपुर प्रधान संघ के अध्यक्ष प्रदीप कवि ने कहा कि जौनपुर-रवांई की एसटी की मांग पूरी तरह ऐतिहासिक और न्यायसंगत है। आने वाले समय में क्षेत्र के सभी विधायकों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न राजनीतिक दलों को इस अभियान से जोड़ने के लिए अलग-अलग स्थानों पर बैठकें आयोजित की जाएंगी।

 

जिला पंचायत सदस्य जोत सिंह रावत ने कहा कि यह आंदोलन सात दशक से अधिक पुराना है और अब इसे निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है।

 

एसटी दर्जा देने की क्या है प्रक्रिया?

 

बैठक में वक्ताओं ने अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की संवैधानिक प्रक्रिया की भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसी समुदाय या क्षेत्र को एसटी सूची में शामिल करने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है। पहले राज्य सरकार प्रस्ताव तैयार कर केंद्र को भेजती है। इसके बाद भारत के रजिस्ट्रार जनरल और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की राय ली जाती है। दोनों संस्थाओं की सहमति मिलने के बाद केंद्र सरकार संसद में संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में संशोधन संबंधी विधेयक लाती है। संसद से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही किसी क्षेत्र या समुदाय को आधिकारिक रूप से अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलता है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *