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देहरादून की मुरझाती धड़कन,जानिए रिस्पना नदी का इतिहास और अभी की दशा

देहरादून: देहरादून की पहचान उसकी हरियाली और पहाड़ी नदियों से रही है। इन्हीं नदियों में एक थी — रिस्पना, जो कभी शहर की जीवनरेखा मानी जाती थी। पर आज वही नदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कभी शुद्ध, स्वच्छ और जीवनदायिनी यह धारा अब एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है। सवाल यह है कि आखिर हमने इस नदी को इस हाल तक क्यों पहुंचा दिया?

कहां से बहती है रिस्पना

रिस्पना नदी की उत्पत्ति राजपुर क्षेत्र की पहाड़ियों से होती थी। ये राजपुर गांव के पास मसूरी पर्वतमाला के तल पर एक छोटे से झरने से निकला करती थी।यह नदी देहरादून शहर से होकर बिंदल नदी के साथ मिलकर ससुआ नदी बनतीं थी और फिर सोंग नदी से मिलकर गंगा में मिल जाती थी।कभी इस नदी की कल-कल करती धारा शहर की शान हुआ करती थी। बच्चे इसके किनारे खेलते थे और लोग इसके स्वच्छ जल का उपयोग पीने व सिंचाई के लिए करते थे।

जब रिस्पना जीवन देती थी

बात सिर्फ दो-तीन दशक पुरानी है, जब रिस्पना का पानी इतना साफ होता था कि लोग सीधे इसमें से पानी भरकर पी लेते थे। इस नदी का अस्तित्व देहरादून की प्राकृतिक संपदा का प्रमाण था।शहर की हवा, मिट्टी और पर्यावरण इसी जलधारा से स्वच्छ रहा करता था।

शहरीकरण ने छीनी सांसें

लेकिन वक्त के साथ देहरादून का चेहरा बदल गया। शहर का बेतहाशा विस्तार, आबादी में इजाफा और अनियोजित निर्माण कार्यों ने रिस्पना का दम घोंट दिया।
नदी के किनारों पर अवैध अतिक्रमण, सीवेज का सीधे नदी में बहाव, और वन क्षेत्र की कटाई ने इसे धीरे-धीरे प्रदूषण की दलदल में धकेल दिया।
आज हालत यह है कि कभी जहां मछलियाँ तैरती थीं, वहां अब प्लास्टिक और गंदगी का ढेर दिखाई देता है।

सरकारी प्रयास और योजनाएं

हालांकि उत्तराखंड सरकार ने समय-समय पर रिस्पना को पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाए थे। सरकार ने 2017 में एक प्रोजेक्ट शुरू किया था “रिस्पना-रिवर रीजूवनेशन प्रोजेक्ट” जो कि रिस्पना नदी के पुनर्जीवन की एक पहल थी। इसके तहत सोंग नदी से रिस्पना को जोड़ने, किनारों पर पौधारोपण करने, एक दिन में 2.5 लाख पौधे लगाना, और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने, किनारों पर से अतिक्रमण हटाना जैसी योजनाएं बनाई गईं।
इसके अलावा, विभिन्न संस्थानों और स्वयंसेवी संगठनों ने भी इस अभियान को जनता के बीच एक जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की थी।

परंतु योजनाओं की घोषणा और धरातल पर उसके अमल में अब भी लंबा अंतर है। शहर के कई हिस्सों में आज भी गंदा नाला सीधे रिस्पना में जा मिलता है, जिससे इसकी सफाई के सारे प्रयास अधूरे रह जाते हैं।

फिर भी उम्मीद बाकी है

रिस्पना की हालत भले ही खराब हो, लेकिन उम्मीदें अब भी जिंदा हैं। कुछ पर्यावरण प्रेमी समूहों और युवाओं ने नदी की सफाई के लिए स्वयंसेवी मुहिमें शुरू की हैं। स्कूलों और कॉलेजों में भी छात्रों को नदी संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

अगर सरकार, प्रशासन और आम जनता मिलकर ईमानदारी से प्रयास करें तो रिस्पना फिर से देहरादून की शुद्ध धारा बन सकती है।

रिस्पना सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि देहरादून की आत्मा है। हमने इसे खोया है, लेकिन इसे बचाना अभी भी संभव है।
अगर आज कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ नाम से “रिस्पना” को जानेंगी, उसकी धारा नहीं देख पाएंगी।

अब वक्त है कि सरकार के साथ-साथ हर नागरिक इस नदी की रक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले।

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