देहरादून: देहरादून ज़िले के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर में इन दिनों आस्था और परंपरा का सबसे बड़ा पर्व जागड़ा (जगरा) पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस मौके पर महासू देवता के प्रमुख सिद्धपीठ हनोल मंदिर में मंगलवार रात से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई थी, जो बुधवार सुबह तक जारी रही। अनुमान है कि इस वर्ष बीस हज़ार से अधिक श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल हुए।
आस्था और मान्यता
स्थानीय मान्यता है कि महासू देवता न्याय के देवता हैं और उनकी पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। हर साल भाद्रपद मास में होने वाले इस आयोजन को लेकर जौनसार-बावर ही नहीं बल्कि पड़ोसी ज़िलों और हिमाचल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
महासू देवता के चार भाई और उनके मंदिर
कहा जाता है कि महासू देवता चार भाई हैं और अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित हैं—
चलदा महासू : हनोल (मुख्य सिद्धपीठ)
बासिक महासू : बिन्हार (जौनसार)
पबासिक महासू : थैना (हनोल के समीप)
बोठा महासू : हिमाचल के मंडोल/सिरमौर क्षेत्र में पूजे जाते हैं।
इन चारों स्थानों पर भी अलग-अलग अवसरों पर जागड़ा पर्व और देव अनुष्ठान होते हैं।
शाही स्नान और पालकी यात्रा
बुधवार को महासू देवता का पारंपरिक शाही स्नान संपन्न हुआ। स्नान के बाद देव चिह्नों को शाही पालकी में विराजमान कर मंदिर परिसर में भव्य शोभायात्रा निकाली गई। यात्रा के दौरान “जय महासू महाराज” के जयकारों से पूरा इलाका गूंज उठा। परंपरा के अनुसार पालकी को उठाने और झुकाने का क्रम भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष मान्यता रखता है।
लोकगीत और जागरण से सजी रात

जागड़ा पर्व की सबसे खास बात इसका रात्रि जागरण है। पूरी रात गांवों से आए हुए लोग लोकगीत गाते रहे और पारंपरिक नृत्य करते रहे। डुगडुगी और रणसिंघे की गूंज पर लोग थिरकते रहे और पूरे वातावरण में आध्यात्मिक उत्साह छाया रहा।
सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक

जागड़ा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि जौनसार-बावर की संस्कृति और लोकधरोहर का जीवंत प्रतीक भी है। यहां हर वर्ग और आयु के लोग एक साथ मिलकर अपनी परंपरा को संजोते हैं। बुजुर्ग जहां रीति-रिवाज़ निभाते हैं, वहीं युवा लोकगीत और नृत्य में भागीदारी निभाते हैं।