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केदारनाथ: नाम की पौराणिकता से लेकर चार धाम में शामिल होने तक की पूरी कहानी

उत्तराखंड: उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि शिवभक्तों की आस्था, इतिहास और मोक्ष का प्रतीक है। जानिए इसके नामकरण से लेकर चार धाम बनने तक की पूरी यात्रा।

 

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में समुद्र तल से 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह न केवल भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, बल्कि उत्तराखंड के प्रसिद्ध ‘छोटे चार धामों’ में से भी एक है। परंतु क्या आप जानते हैं कि इस स्थान का नाम ‘केदारनाथ’ क्यों पड़ा और यह चार धामों में कैसे शामिल हुआ? चलिए जानते हैं इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल की रोचक कहानी।

 

आखिर क्यों पड़ा ‘केदारनाथ’ नाम?

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहते थे और भगवान शिव के दर्शन की तलाश में केदारखंड (उत्तराखंड) पहुंचे। शिव जी भैंसे के रूप में उनसे छिप गए, लेकिन भीम ने उन्हें पहचान लिया और पकड़ने का प्रयास किया। संघर्ष के दौरान शिव भूमिगत हो गए और उनका पृष्ठ भाग केदारनाथ में प्रकट हुआ। उसी स्थान पर बाद में केदारनाथ मंदिर का निर्माण हुआ।

 

‘केदार’ शब्द संस्कृत में खेत या पवित्र भूमि का प्रतीक है, जबकि ‘नाथ’ का अर्थ है स्वामी या ईश्वर। इस तरह ‘केदारनाथ’ का अर्थ हुआ — पवित्र भूमि के स्वामी —जिसका मतलब है भगवान शिव।

 

केदारनाथ कैसे बना चार धाम का हिस्सा?

 

उत्तराखंड के चार धाम — यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ — को ‘छोटे चार धाम’ कहा जाता है। ये पवित्र स्थल हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं और इनकी यात्रा को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह परंपरा 18वीं से 20वीं सदी के बीच स्थापित हुई जब उत्तराखंड के चार तीर्थों को एक संगठित तीर्थ यात्रा के रूप में देखा जाने लगा।

चारों धामों में से केदारनाथ शिव को समर्पित है और शैव परंपरा का प्रमुख केंद्र है।

*यमुनोत्री और गंगोत्री: जीवन के प्रारंभ और शुद्धता का प्रतीक।  *केदारनाथ: विनाश और मोक्ष का प्रतीक (शिव तत्व)।बद्रीनाथ: पालनकर्ता विष्णु का धाम।

इस क्रम में केदारनाथ का स्थान तीसरे नंबर पर आता है, जो संहार और मोक्ष का प्रतिनिधित्व करता है।

 

केदारनाथ का इतिहास और आध्यात्मिक महत्व

 

ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में किया था। उन्होंने भारतीय संस्कृति और तीर्थ यात्रा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से देशभर में चार धाम स्थापित किए, जिसमें बद्रीनाथ (उत्तर भारत) एक था। बाद में, स्थानीय श्रद्धा और धार्मिक प्रभावों के चलते ‘हिमालयी चार धाम’ की मान्यता बनी, और उसमें केदारनाथ को प्रमुख स्थान मिला।

 

केदारनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक आस्था, इतिहास और अध्यात्म का संगम है। इसका नामकरण भगवान शिव की लीला से जुड़ा है और चार धामों में इसका स्थान हमें जीवन के अंत और मोक्ष की ओर प्रेरित करता है। यहां की यात्रा केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि आत्मिक यात्रा भी होती है।

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