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भोजनमाताओं ने मुख्यमंत्री को दिया ज्ञापन,दो वर्ष बीतने पर भी अपने वादे पूरा नहीं कर रही है सरकार

देहरादून: अपनी मांगों को लेकर भोजनमाताओं ने धरना प्रदर्शन किया और मांगों का ज्ञापन उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री को सौंपा। भोजनमाताओं ने कहा कि चुनाव के दौरान किए गए वादों को अभी तक पूरा नहीं किया गया है।

प्रगतिशील भोजनमाता संगठन उत्तराखंड ने अपनी कानूनी मांगों को लेकर देहरादून में 2 और 3 जून को सुबह 11 बजे जुलूस निकालकर मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचे। जहां संगठन ने अपनी मांगों का ज्ञापन में मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार को सौंपा।

इस प्रदर्शन में भोजनमाताओं ने अपनी मुख्य मांगे रखी जिसमें, भोजनमाताओं को स्थाई रोजगार, न्यूनतम वेतन लागू करने, सामाजिक सुरक्षा पी.एफ और ई.इस.आई को लागू करने, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा की भोजनमाताओं का मानदेय तीन हजार से बढ़ाकर पांच हजार रुपए किए जाने, अक्षय पत्र फाउंडेशन पर रोक लगाने व भोजनमाताओं से अतिरिक्त कार्य करवाने पर रोक लगाना इत्यादि मांगो का ज्ञापन मुख्यमंत्री को दिया गया है।

उत्तराखंड में वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा था कि अगर हमारी सरकार आई तो हम भोजनमाताओं का मानदेय 5000 रुपए करेंगे। लेकिन चुनाव के दो वर्ष बीत जाने के बाद भी मुख्यमंत्री अपनी घोषणा को लागू नहीं कर रहे हैं।

 

प्रगतिशील भोजनमाता संगठन की अध्यक्ष शारदा ने कहा कि पूरे उत्तराखंड में भोजनमाताएं 3000 जैसी मामूली मानदेय में बेगारी कर रही है। हम पहले भी कई बार अपनी मांगे लेकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन दे चुके हैं लेकिन अभी तक हमारी समस्याओं पर सुनवाई तो दूर हमे मिलने तक का मौका भी नहीं दिया जाता है। हम अपने संगठनों के द्वारा सरकार को आगाह कर रहे हैं कि अगर हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो हम अपने आंदोलन को ओर व्यापक करेंगे और अगली बार और बड़ी ताकत लेकर राजधानी आयेंगे।

प्रगतिशील भोजनमाता संगठन की महासचिव रजनी ने कहा कि आज ये स्थिति सिर्फ भोजनमाताओं की नहीं है बल्कि तमाम स्कीम वर्कर्स की यही स्थिति है। सरकारें अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए योजनाएं तो लागू कर लेती हैं लेकिन इन योजनाओं मे काम करने वाले कर्मचारी बहुत कम तनख्वा में बदतर परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। कहने को भारतीय संविधान में बेगारी कानूनी रूप से अवैध है लेकिन सरकार खुद अपनी योजनाओं में इन वर्कर से उनके मानदेय के अतिरिक्त काम करवा कर एक तरह से बेगारी ही करवा रही है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मध्याह्न भोजनकर्मियों द्वारा करवाए जा रहे काम को बेगार का नाम देके उसके खिलाफ दिया गया फैसला इसका साक्ष्य है।

विभिन्न ब्लॉक से आई भोजनमाताओं ने कहा कि सरकार द्वारा आदेश पारित किया गया है कि केवल वहीं महिला भोजनमाता का काम कर सकती है जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हो लेकिन हम पूछना चाहते हैं कि ये कानून मोटी तनख्वा लेने वाले सरकारी कर्मचारियों या सांसदों या विधायकों पर क्यों लागू नहीं होती है जिनके बच्चे न केवल महंगे निजी स्कूलों में बल्कि विदेशों में पढ़ते है।

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